

शाेर बढ़ा:चौक-चौराहों पर 80 से अधिक डेसिबल की आवाज, डॉक्टर बोले- ऐसे लोगों को 3 माह में कानाें की जांच करानी चाहिएडिप्टी सीएमओ ने कहा- ट्रैफिक इंचार्ज काे लिखेंगे पत्र, कम संख्या में राेजाना पुलिसकर्मियाें की कराएं जांच
औद्याेगिक नगरी हाेने के साथ-साथ शहर में बढ़ते वाहनाें के कारण शहर के मुख्य चाैक-चाैराहाें पर 80 से अधिक डेसिबल से ज्यादा शाेर हाे रहा है। जाेकि आमजन के कानाें के लिए बहुत ही नुकसानदायक हैं। जबकि औसतन कानाें के लिए 60-65 डेसिबल आवाज सामान्य हाेती है।
डाॅक्टराें के मुताबिक इन चाैक-चाैराहाें पर 8-8 घंटे काम करने वाले ट्रैफिक पुलिसकर्मियाें के कानाें की सुनने की श्रमता कम हाे रही हैं। ऐसी जगहाें पर काम करने वाले लाेगाें काे औसतन हर तीन माह में जांच करानी चाहिए।
डिप्टी सिविल सर्जन डाॅ. शशि गर्ग के मुताबिक सिविल सर्जन डाॅ. संतलाल वर्मा से चर्चा करके ट्रैफिकपुलिसकर्मियाें की जांच कर सकते हैं। इसके लिए ट्रैफिक इंचार्ज काे पत्र भेजा जाएगा कि राेजाना सीमित संख्या में पुलिसकर्मियाें काे कानाें की जांच कराने के लिए अस्पताल में भेजें। अब राष्ट्रीय श्रवण जागरूकता अभियान बुधवार से 21 मार्च तक चलेगा। नवजात बच्चों की स्क्रीनिंग होगी।
बुजुर्गों सहित सभी मरीजों की श्रवण शक्ति जांची जाएगी। प्रत्येक बुधवार को दिव्यांगों के कानों की जांच होगी। जरूरतमंदों को जिला रेडक्राॅस सोसायटी और जनसेवा दल के माध्यम से श्रवण मशीन मुहैया कराई जाएगी।
स्पीच थैरेपी, काउंसिलिंग जैसी सुविधाएं देंगे
डिप्टी सीएमओ डाॅ. शशि गर्ग ने बताया कि भारत में प्रति एक लाख आबादी पर 291 व्यक्ति ऐसे हैं, जो सुनने में असक्षम हैं। इनमें शून्य से 14 वर्ष तक की आयु के बच्चों की संख्या अधिक है। अनुवांशिक,जन्म से जटिलताओं, अत्यधिक शोर और बढ़ती उम्र बहरापन का कारण हो सकती है। मरीजों के कानों की जांच के साथ स्पीच थैरेपी, काउंसिलिंग जैसी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।
60-65 डेसिबल शाेर ही सहन कर पाते हैं कान
ईएनटी सर्जन डाॅ. भूपेश चाैधरी ने बताया कि इंसान के कान 60-65 डेसिबल शाेर ही सहन कर पाते हैं। इससे ऊपर हाे ताे कान डैमेज भी हाे सकते हैं। शादी समाराेह में ढाेल और डीजे का शाेर 100 डेसिबल से ऊपर तक पहुंच जाता है जाेकि बहुत खतरनाक है। एेसी जगहाें पर काम करने वाले लाेगाें काे औसतन हर तीन माह में जांच करानी चाहिए।
ऐसे परख सकते हैं बच्चे की सुनने की शक्ति
3 माह की आयु में : ऊंची आवाज में प्रत्युत्तर देना। जोर का धमाका होने पर पलक झपकना। नजदीक शोर होने पर अचानक जागना।
6 माह की आयु में : मां के बोलने पर पीछे मुड़कर देखना। आवाज के प्रति कोई रुचि नहीं दिखाना। ध्वनि के स्त्रोत को सिर या आंखों की गतिशीलता से निर्धारित करना।
9 माह का होने पर : माता-पिता के बोले छोटे शब्द आओ-जाओ को समझना। आवाज करने वाले खिलौनों में रुचि। तुतलाहट जैसी ध्वनि निकालना।
15 माह का होने पर : नाम पुकारने पर प्रत्युत्तर देना। मां, पिता, दादा जैसे छोटे शब्द बोलना। दूसरों के शब्दों की नकल करना।
2 साल की आयु में : साधारण निर्देश जैसे नाक को छुओ, अपना पेट दिखाओ आदि का जबाव देना।