

सरकार पर भारी सेना:म्यांमार में 48 साल तक सैन्य शासन रहा, लोकतंत्र के लिए 22 साल अकेले लड़ती रहीं सू कीम्यांमार में सेना ने सोमवार को फिर सत्ता अपने हाथ में ले ली। 1948 में आजादी मिलने के बाद से देश में ज्यादातर वक्त सेना का शासन रहा है। 1962 में सेना यहां सत्ता पर काबिज हो गई थी। सेना की तानाशाही से आजादी दिलाने के लिए आंग सान सू की ने 1988 में लड़ाई शुरू की। उनके नेतृत्व में 1989 में हजारों लोग लोकतंत्र की मांग कर तब की राजधानी यांगोन की सड़कों पर उतर गए।
सेना की ताकत के आगे सू की का आंदोलन कमजोर पड़ गया। उन्हें नजरबंद कर दिया गया। अगले 22 साल तक म्यांमार में सेना का ही शासन रहा। इनमें से 21 साल सू की नजरबंद रहीं। आखिरकार 2011 में उनकी लड़ाई खत्म हुई और सेना की जगह चुनी गई सरकार ने देश की बागडोर संभाली।सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (NLD) ने चुनाव में जीत हासिल की। संविधान के मुताबिक, वे राष्ट्रपति का चुनाव नहीं लड़ सकती थीं। इसलिए सू की को स्टेट काउंसलर बनाया गया। संसद में सेना की मौजूदगी के लिए उसके प्रतिनिधि रखे गए।
जीत के बावजूद कम होती गई सू की की लोकप्रियता
2015 में हुए दूसरे चुनाव में भी सू की को जबरदस्त जीत मिली। हालांकि, कमजोर अर्थव्यवस्था, सरकार में सेना के वर्चस्व और रोहिंग्या मुस्लिमों का मामला न संभाल पाने की वजह से उनकी लोकप्रियता गिरने लगी। हालात ऐसे हो गए कि 1988 में सेना के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले कार्यकर्ता सू की की नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी के खिलाफ खड़े हो गए।2012 में रखाइन प्रांत में गृह युद्ध जैसे हालात बन गए। यहां सेना पर रोहिंग्या मुसलमानों पर अत्याचार के आरोप लगे। 2017 में लगभग 7 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों की मौत हुई। हालात संभालने के लिए सरकार कोई ठोस कदम उठा नहीं पाई। इसका फायदा सेना को मिला और वह सरकार के मुकाबले मजबूत होती गई।